कभी फिर ना आना Poem by abhilasha bhatt

कभी फिर ना आना

Rating: 5.0

तुम फिर गुम हो गए
उसी तरह
जैसे पहले तुम
बिन कुछ कहे
गुम जाने कहाँ हो गए थे
ना कोई उम्मीद का सिरा कोई
हाथों में मेरे सौंप गए
ना कोई अधूरा ख़त
मेरे नाम छोड़ गए
कोई उम्मीद ना हो तो
जि़न्दगी लाहासिल सी लगती है
जब बार तुम पहली आए
साथ में कुछ चुने
एक अलग मुत्मईन एहसास को
साथ अपने लाए
पहली दफा तो तुम्हारे जाने पर
मन को कईं कोशिशों के बाद
बताया समझा
समझाया माना मनाया
कभी खुद को
कभी मासूम भोले दिल को
जिसे जाने कितनी ही बार हम
बेवकूफ़ बनाते हैं बहलाते हैं
फुसलाते है बहकाते हैं
बेचारा मान भी तो जाता है
हर बात को सच जानकर मानकर
माना कि तुम आए
और आकर चले भी गए
रही होगी मजबूरियाँ कुछ तो तुम्हारी भी
ख़ुदग़र्ज़ कोई अपना इतना नही होता
मगर जब चले ही गए थे
तो क्यों लौटकर तुम वापस आए
उसी तरह से
जैसे पहली मरतबा आए थे
साथ अपने वही बात पुरानी लाए हो
भूली बिसरी यादें साथ लाए
और फिर उसी तरह से
बिन कुछ कहे
बिन कुछ बताए गुम फिर हो गए
मगर अब जो गए हो
तो बुरा नहीं लग रहा है
एक अनजान सा सुकून और सुख़न महसूस हो रहा है
बीता ग़म बीतता जा रहा है
गुम होता जा रहा है
सुनो!
अब के जो गए हो
तो लौट कर वापस ना आना
कभी फिर ना आना

Tuesday, December 27, 2016
Topic(s) of this poem: friendship,life
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 31 December 2016

Jane wale laut kar nahi aate woh jo duniya se ruksat ho gaye lekin jo rooth gaye aur bhatak gaye wo laut aate hain aksar....Lekin ek tuta dil ye kehta hai sada ki Kabhi phir na aana...Maza aa gaya..10+++

0 0 Reply
Mithilesh Yadav 27 December 2016

A great work mam ji, aapki Hindi ka to jawab hi nhi .... Bhaut khubh

1 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success