नोट चर्चा Poem by C. P. Sharma

नोट चर्चा

कभी नोटों का अभाव था,
इंसानियत का प्रसार था।
अब नोटों की बौछार है,
सर्वत्र भ्रष्टाचार है।

नोटों की मारा मार में
शिस्टाचार तिरस्कार है।
राजनैतिक पैंतरों में
लूट पाट मार धाड़ है।

नोट बिन न वोट मिले,
नोट से ही होठ सिले।
नोट बिन न न्याय मिले,
नोट से मिट जाएँ गिले।

नोटों की राजनीति है,
व्यापार में अनीति है,
नोटों की दौड़ धूप में
खोई रिश्तों की प्रीत है।

अब तो देवालयों में भी
नोटों का बोलबाला है,
नोट चढ़ाओ दर्शन पाओ
नहीं तो बाहर ही प्रसाद चढ़ाओ।

नोटों से भ्रमित भुल्ल्या में
खोया हुआ इन्सान है ।
अपनी सुध बुध खो बैठा
दर दर भटके जैसे स्वान।

ये वक्त का गुबार है
या ज़िन्दगी का सार है?
नोट ही है ज़िन्दगी
या ज़िन्दगी पे न्योछावर?

नोट चर्चा
Wednesday, December 28, 2016
Topic(s) of this poem: corruption,money
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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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