आह! यह कैसी मानसिकता है? Poem by Tribhawan Kaul

आह! यह कैसी मानसिकता है?

भीड़ भाड़ के हो हल्ले में
गुंडे मवाली संभ्रान्त मनचले
विकारों के मरीज़
ना सभ्यता ना कोई तमीज
अपने घर में बहनों पर भड़कने वाले
दूसरों की बहनो पर नज़र डाले
खुलेआम नोचते हैं
ज़िस्म के हर उस भाग को
जो उनके मोतिया बिंधी चक्षुओं को
कसाई की दूकान पर लटके
बकरी के मांस सा लगता है
आह! यह कैसी मानसिकता है?

हराम के इन पिल्लों को
पिल्ला भी नहीं कह सकते
पिल्लों की तोहीन होती है
इनकी अपनी माँ बहन बेटी बहु भी
नज़रों में इनकी शायद माशूक होती है
संस्कारों की दुहाई क्या दें
कर्म इनकी बलि चढ़ाते हैं
समाज में फैले कोड हैं यह
लचर व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हैं
देश इनके रहते रसातल सा लगता है।
आह! यह कैसी मानसिकता है?

क्यों नहीं संगसार करते?
पुरुषत्व को तार तार करते ?
इन वहशियों को छोड़ना क्यों?
क्यों नहीं शर्मसार करते?
नपुंसकों का देश
अब मुझको लगने लगता है
आह! यह कैसी मानसिकता है?
आह! यह कैसी मानसिकता है?
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सर्वाधिकार सुरक्षित / त्रिभवन कौल/ 05-01-2017

आह! यह कैसी मानसिकता है?
Monday, January 9, 2017
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Tribhawan Kaul

Tribhawan Kaul

Srinagar (J & K) India
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