तुम्हें कुछ भी कहने की
तमाम कोशिशें नाकाम होती नज़र आतीं है
मानाे कोई वजह ही बाकी ना रही हों
कुछ भी कहने सुनने की
तुमसे शिकवे शिकायतों के
तमाम दौर बेमतलब और लाहासिल हो गए हों मानाे
ना किन्ही अल्फ़ाजों में कोई लम्स बाकी रहा हो
जि़न्दा रहने की तरह से
नाकाम बेमानी तरह से
बचा हो अगर तो
कहीं शून्य में गुम होता हुआ तुम्हारे होने की तमाम
कईं सिलवटों में सिमट कर रह गईं कईं उम्मीदें
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