तुम्हें कुछ भी कहने की Poem by abhilasha bhatt

तुम्हें कुछ भी कहने की

तुम्हें कुछ भी कहने की
तमाम कोशिशें नाकाम होती नज़र आतीं है
मानाे कोई वजह ही बाकी ना रही हों
कुछ भी कहने सुनने की
तुमसे शिकवे शिकायतों के
तमाम दौर बेमतलब और लाहासिल हो गए हों मानाे
ना किन्ही अल्फ़ाजों में कोई लम्स बाकी रहा हो
जि़न्दा रहने की तरह से
नाकाम बेमानी तरह से
बचा हो अगर तो
कहीं शून्य में गुम होता हुआ तुम्हारे होने की तमाम
कईं सिलवटों में सिमट कर रह गईं कईं उम्मीदें

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