Dr. Navin Kumar Upadhyay


अश्कों को थाम लेना तुम - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

याद जब भी मचल जाए,
अपने अश्कों को थाम लेना तुम।
जिन्दगी एक खुली किताब मेरी,
बची न कोई अनकही कहानी ।
बातें तन-मन-अन्तरँग-अँग की,
सब सामने दीख रहीं जुबानी।।
यदि कुछ भी समझो बची रह गईं,
तनहाई के पलों में अपने ही दिल,
खुद नजर गड़ा, हेर लेना तुम ।
हुआ यकीन न, जब मैंने अपनी,
सब दास्ताँ सूना दी ।
ऐसी ही कुछ बन गई है मेरे् प्यारे
मेरे किस्मत की बदकिस्मती।.
तन गुजर जाने के बाद जब,
सारी हकीकत सामने आएगी,
अपने दिल पर हाथ रखकर तब,
मेरी बात मान लेना तुम।
बयान जो मैंने कर दिए,
दास्तान-ए-जिन्दगी सब कुछ,
खुदा की कसम! गलत नहीं कभी कहा कुछ,
तुम्हारी तो शिकवा है, मेरी हर करतूतों से
दया-दुआ की नजर रख, माफ कर देना तुम।
तेरे तन-मन-जिगर में बसता मेरा मन,
चाहता सिमट जाने को, मेरे अँग का कण-कण,
हरेक अरमान-ख्यालों में सलूक होना चाहता,
बस अपनी अरमानों में, मुझे बनाये रखना तुम।
यदि सिर को सँवारने की बात आ जाये,
तो मुझै अनुरागमय कण समझ लेना,
यदि बालों को सजाने का हौसला बन जाये,
मुझे परागमय पुष्पदल जान लेना ।
यदि नयनों को निहारने का मन बँध जाये,
मुझे काले अँजनों रुप निहार लेना।
यदि लबों के सिमटने का मौका मिल जाये,
अरुणिम आभा के रुप मान लेना तुम ।
यदि हाथों में ढूँढने का मन बन जाये,
कँकणों की खनखनाहट में जाना जाये,
मगर पाँवों में ढूँढने की यदि नौबत हो,
नूपुर के मधुर रवों में जान लेना तुम,
इतना ढूँढने हेरने पर भी, यदि सुकूँ न मिले,
अतीत की मधुर स्मृतियों में, डूब जाया जाये,
लेकिन याद इतना रखना हमेशा, मेरे हमसफर
कि नयनों के नीर को, सदा बाँधे रखना तुम ।

Topic(s) of this poem: love


Comments about अश्कों को थाम लेना तुम by Dr. Navin Kumar Upadhyay

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



[Report Error]