कब होगा? Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

कब होगा?

कब होगा?
Friday,25th September 2020

कब होगा इसका अंत
क्या मुसीबतें चलती रहेगी अनंत?
ना हो पाएगा इसका निपटारा?
संसार देख रहा बेसहारा।

में तो सहन कर लुंगी
सब को माफ़ भी कर दूंगी
में बन जाउंगी गूंगी
ना आवाज उठाउंगी और नाही बोलूंगी।

सब मेरा बखान करते है
समय आनेपर शीश भी झुकाते है
मेरी तारीफ के फूल भी बांधते है
समा बांधते थकते नहीं है।

अबला नारी तो जरूर हूँ
पर माँ बनकर संसार को निभाती हूँ
पुरे विश्व की में जननी
पर अलग ही है मेरी कथनी!

सब को मेरे प्रति है चाह
मेरे में ही ढूंढतेहै राह
कहते है संसार एक छोर है मेरे आँचल
फिर भी लोग हो जाते है मेरी ओर चंचल।

मेरे आगोश में है शांति का आगाह
शीश झुका लो दरगाह
मंदिर में पालो मेरे अस्तित्व का मिजाज
तुरंत ही हो जाएगा आपको एहसास।

ऐसी माँ आप कब न्याय दिलाओगे?
कब उसके आँचल में भक्ति का रंग दोगे?
में कराह रही हूँ, हांफ ऱही हूँ
मेरी ऐसी दुर्दशा को कोस रही हूँ।

डॉ. जाड़िआ हसमुख

कब होगा?
Friday, September 25, 2020
Topic(s) of this poem: poem,september
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success