एक एहसास तुम्हारा Poem by abhilasha bhatt

एक एहसास तुम्हारा

Rating: 5.0

तुम जानते हो
तुम मुझे याद आते हो
बहुत याद आते हो
मगर कभी तुमसे मिलने की
कोई उम्मीद नज़र ही नही आती
आए भी तो आए कैसे
कोई डोर है भी तो नही
ना कोई सिरा
किसी उम्मीद का
जो तुम तक आती हो
किसी दिशा से
कहीं क्षितिज पर
बस एक एहसास ही है पास मेरे
जब याद करूँ तुमको
जो दिल में उतर कर
आँखों तक आ जाता है
किसी मुत्मईन हसीन ख़्वाब की तरह
जो उजड़ी शामों में बहार लेकर आते हैं
और जो सूनी सुबह में साथ तुम्हारे होने के
मेरे आसपास और कभी तुम
हक़ीकत तक का सफ़र तय कर कर
मेरे साथ होगे मेरे पास होगे
यही उम्मीद दे जाता है
क्या तुमको भी यही महसूस होता है
यही एहसास क्या तुम्हारी
शामों सहर में
तुम्हारे दिल के आशियानें के दरीचे से झाँकते हैं
कमाल है ना
एहसास हर गिरह से किस कदर आज़ाद है

Thursday, March 23, 2017
Topic(s) of this poem: poetry
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 04 April 2017

कविता कथ्य और अभिव्यक्ति में पाठक को प्रभावित करती है. फ़िराक गोरखपुरी का एक शे'र याद आ गया: न कोई वादा न कोई यक़ीं न कोई उम्मीद, मगर हमें तो तेरा इंतज़ार करना था।

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