एक इन्तजा़र Poem by abhilasha bhatt

एक इन्तजा़र

Rating: 5.0

कुछ रिश्तों का अंजाम
बहुत दर्द से भरा होता है
जैसे कोई उम्मीद
जो बड़े दिल से लगाई हो
बड़े सलीके से सजाई हो
बेतरबियत से टूट कर बिखर जाए
उसके और मेरे रिश्ते का हाल भी
कुछ यूँ इस कदर हुआ
वो चला भी गया
और मैं राहों पर एक टक नज़र टिकाए
वहीं मुन्तजि़र बनी
इन्तजा़र में उसके
बैठी रही मगर
वो अाजतक ना आया
और मैं इन्तजा़र करती रही
किसी रास्ते की तरह
जो अपनी मन्ज़िल तक जाने के लिए
किसी मुसाफ़िर का इन्तजा़र करती है

Tuesday, April 4, 2017
Topic(s) of this poem: life,love
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 04 April 2017

प्रिय के वियोगसे उत्पन्न भावनाओं का वेग और उनकी सुंदर अभिव्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ी है. आपका धन्यवाद. वो चला भी गया / और मैं राहों पर एक टक नज़र टिकाए बैठी रही मगर / वो अाजतक ना आया और मैं इन्तजा़र करती रही

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