साहिर के नाम जज़बात Poem by abhilasha bhatt

साहिर के नाम जज़बात

Rating: 5.0

बेशुमार मोहब्बत है तुझसे मुझे
जाने तुम्हारी ग़ज़लों का असर है
या उनमें बसे बेलौस लम्स का
हर लम्हा तुमसे मुलाक़ात होती है मेरी
जब भी तुम्हारी नज़्म पड़ती हूँ
तमाम गिरहों से ज़िन्दग़ी की खुदको
आज़ाद पाती हूँ
ख्वाहिशों का बोझ उतारा जबसे है मैंने
जि़न्दगी मुत्मईन और बोझ से बहुत दूर
होती हुई सुकून के चश्मों से नज़र आती है
तुम्हारी नज़्म मुझे तुम तक ले आती हैं
जिस्मानी तौर पर तो ये मुम्किन नहीं
मगर रुहानी तौर पर सच है
तुम मेरे आसपास हो रहते हरदम
जब भी मैं नज़्म में लिखी तुम्हारी पड़ती हूँ
रात बहुत देर तक
तुम मेरे साथ हो " साहिर " ऐसा महसूस मुझको होता है
बस इसी तरह से मरे पास रहना मेरे साथ रहना

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 13 April 2017

यह साहिर की रूमानी और क्रांतिकारी शायरी का ही प्रभाव है कि पाठक उससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है और उसमे अपनी भावनाओं का अक्स देखता है. बहुत सुन्दर कविता. धन्यवाद, अभिलाषा जी.

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