बेशुमार मोहब्बत है तुझसे मुझे
जाने तुम्हारी ग़ज़लों का असर है
या उनमें बसे बेलौस लम्स का
हर लम्हा तुमसे मुलाक़ात होती है मेरी
जब भी तुम्हारी नज़्म पड़ती हूँ
तमाम गिरहों से ज़िन्दग़ी की खुदको
आज़ाद पाती हूँ
ख्वाहिशों का बोझ उतारा जबसे है मैंने
जि़न्दगी मुत्मईन और बोझ से बहुत दूर
होती हुई सुकून के चश्मों से नज़र आती है
तुम्हारी नज़्म मुझे तुम तक ले आती हैं
जिस्मानी तौर पर तो ये मुम्किन नहीं
मगर रुहानी तौर पर सच है
तुम मेरे आसपास हो रहते हरदम
जब भी मैं नज़्म में लिखी तुम्हारी पड़ती हूँ
रात बहुत देर तक
तुम मेरे साथ हो " साहिर " ऐसा महसूस मुझको होता है
बस इसी तरह से मरे पास रहना मेरे साथ रहना
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यह साहिर की रूमानी और क्रांतिकारी शायरी का ही प्रभाव है कि पाठक उससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है और उसमे अपनी भावनाओं का अक्स देखता है. बहुत सुन्दर कविता. धन्यवाद, अभिलाषा जी.