कितना अजीब एहसास है Poem by abhilasha bhatt

कितना अजीब एहसास है

Rating: 5.0

कितना अजीब एहसास है ये
बयान करने में मुश्किल महसूस हो रहा है
तुम किसी और को चाहते हो
और मैं तुम्हारी चाहतों की गिरफ्त में
उससे कितनी चाहत है तुमको
हर दफा जब हम बातों में मिलते हैं
तब कईं बार तुम कहते हो
मगर मैं अपने जज़्बात-ए-खयालात
किससे कहूँ कैसे कहूँ
कौन से लफ़्जो़ं को कहूँ
कि मेरे जज़्बातों को बयान करो
तुम बस अपनी ही कहते रहे
सुनाते रहे अपनी हमेशा
कभी मुझसे नहीं मालूम किया
कि कैसी बीत रही है जि़न्दगी मेरी
किसी ने भी नही पूछा किया ये मुझसे कभी
दर्द महसूस होता है बहुत
मानाे ख़ला हो कईं सीने में
जिन पर बीतते वक्त के साथ
मिट्टी की कईं परते पड़ गई हैं
और कोई नही आएगा उन्हें ढूंढने के लिए
तुम बस कहते जाना अपनी
मैं सुनाती रहूँगी तुम्हारी
क्योंकि सुनने वाला जब कोई ना हो
जि़न्दगी में हमारी तब महसूस कैसा होता है
बड़ी गहराई से जानती हूँ मैं
यकीन है मुझको ये कि तुम
कभी समझ नही पाओगे जज़्बात मेरे
ना कभी बयाँ कर पाऊंगी मैं

Friday, April 14, 2017
Topic(s) of this poem: pain
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 14 April 2017

दो चाहने वालों के बीच तीसरे व्यक्ति का आना, संप्रेषण की कमीं या आपसी विश्वास का अभाव इस 'खला' का मूल कारण है- इन सभी अनुभूतियों को आपने खूबसूरती से अपने शब्दों में बयान किया है. धन्यवाद अभिलाषा जी.

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