हर आहट पर लगा तुम हो
कितनी ही दस्तकें हुई
और हर दस्तक पर लगा मुझको तुम हो
तमाम सफ़र भर
गुमाँ हुआ पीछे से आवाज़ देता है मुझको कोई
नज़रों के सामने कोई ना था
और मुझको लगा तुम हो
हर दुआ में यही माँगा
कि जब ढूँढे दिल तुमको
तो तुम रहो
इस तरह से कि तुम
ताउम्र तुम बसे रहो
किसी महकते ख़्वाब की तरह
खुशनुमा जि़न्दगी के
बेलौस एहसास की तरह
शिद्दत से की मोहब्बत की तरह
ढलते हुए सूरज को
शामों से मिलने की तरह
जब भी इन तमाम
मुत्मईन खुशबूओं को
अपने पास अपने साथ पाया
तो लगा जैसे तुम हो
तुम कहाँ हो
कौन सी दिशा में हो
कौन से साहिल पर हो
बता भी दो मुझको
मोहब्बत में बिछड़ना ही नहीं
मिलना भी ज़रूरी है
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आपकी कविता में प्रेम के कई रंग हैं जिसमें प्रिय से दूरी व हृदय की व्याकुलता का रंग सबसे प्रमुख है. निम्न शब्द उल्लेखनीय हैं: मोहब्बत में बिछड़ना ही नहीं.... मिलना भी ज़रूरी है