मिलना भी ज़रूरी है Poem by abhilasha bhatt

मिलना भी ज़रूरी है

हर आहट पर लगा तुम हो
कितनी ही दस्तकें हुई
और हर दस्तक पर लगा मुझको तुम हो
तमाम सफ़र भर
गुमाँ हुआ पीछे से आवाज़ देता है मुझको कोई
नज़रों के सामने कोई ना था
और मुझको लगा तुम हो
हर दुआ में यही माँगा
कि जब ढूँढे दिल तुमको
तो तुम रहो
इस तरह से कि तुम
ताउम्र तुम बसे रहो
किसी महकते ख़्वाब की तरह
खुशनुमा जि़न्दगी के
बेलौस एहसास की तरह
शिद्दत से की मोहब्बत की तरह
ढलते हुए सूरज को
शामों से मिलने की तरह
जब भी इन तमाम
मुत्मईन खुशबूओं को
अपने पास अपने साथ पाया
तो लगा जैसे तुम हो
तुम कहाँ हो
कौन सी दिशा में हो
कौन से साहिल पर हो
बता भी दो मुझको
मोहब्बत में बिछड़ना ही नहीं
मिलना भी ज़रूरी है

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 17 April 2017

आपकी कविता में प्रेम के कई रंग हैं जिसमें प्रिय से दूरी व हृदय की व्याकुलता का रंग सबसे प्रमुख है. निम्न शब्द उल्लेखनीय हैं: मोहब्बत में बिछड़ना ही नहीं.... मिलना भी ज़रूरी है

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