पुष्प और भ्रमर Poem by C. P. Sharma

पुष्प और भ्रमर

पुष्प की एक चाह थी
कोई प्रेमी भ्रमर मुझे चूम ले,
झूमते एक कृष्ण वहां
आ बैठा भावना संज्ञान ले।

उसने कहा, लो आ गया
मै हूँ तेरा आशिक़ भ्रमर,
मै भी प्यासा हूँ तेरे प्रेम का
रस पान करू दिनरात मैं।

तुझ में ही मेरा निवास है
तू ही मेरी अविरल प्यास है,
मै प्रियतमा के हृदय में रहूँ
तुझ पे मुझे अटल विश्वास है।

जन्मांतरों से हमारा साथ है
नव रंग में, नव रूप में,
हम एक दूसरे के साथ थे
फिर से मिलेंगे नव रंग में।

मिटटी से फिर से करेंगे
रचना नए संसार की,
और परिभाषित करेंगे
फिर से अपने प्यार को।

पुष्प और भ्रमर
Wednesday, April 19, 2017
Topic(s) of this poem: flower,love
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 19 April 2017

पुष्प और भ्रमर के पुरातन साहित्यिक संबंध को नए व सुंदर रूप में कवि ने प्रस्तुत किया है. बहुत बहुत धन्यवाद.

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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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