आज की सैर में
था ये हवा का झोंका
इन पंक्तियों को
बाहर आने का मिला मौका।
ये हवा ये हवा
थी बसंती हवा।
चल रही थी कुछ
इठलाती हुई
बल खाती सी हवा
फूलों में खिलखिलाती सी हवा
महकती सी और
महकाती सी हवा
कुछ बहकी बहकी सी
बहकाती सी हवा
कोई प्रेम का गीत
सुनाती सी हवा
नव रंग लिए
नव प्रसंग लिए
नव संगीत लिए
ये बहे जा रही थी। ये हवा.... थी बसंती हवा।
मै भी इसके संग
बहका बहका
इसकी मंद सुगंध में
मेहका मेहका
इस के नव रंगों में
रंगता हुआ
नव प्रसंगों के संग
मै बहता ही रहा
जीवन संगीत
कुछ ऐसे बहा
मै प्रीत का गीत
गुनगुनाता रहा। ये हवा.... थी बसंती हवा।
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