शब्दों के आँगन में जब
सुरों का पंछी गाता है
वहाँ संगीत का मेला सा लग जाता है
कानों से मन में उतरकर
विचारों को चेतना देते हैं
आँगन में मीठी धुन फुदकने लगती है
शब्द इठला इठला कर चलते है
अपने होने का गुमान जताते हैं
शब्दों के संसार में
ना कोई हाहाकार है
ना प्रश्न है
ना कोई विस्मयबोधक है
अपने दायरों में रहते हैं
शांत दरिया में
चुपचाप बहते रहते हैं
अंत में मन चेतना खोकर
शून्य में विचरता है
***
शब्द जो कभी नि शब्द थे आज बोल पड़े तुम्हारे आँगन मे बहुत - बहुत बेहतरीन कविता रचना 100+
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Bahut bahut behatreen shabdo ke jugalbandi nausheen. Aati uttam. Alfaz kam ho jate hai aapke teranbazi talee. Dhanyawad.