जब सुबह इतनी खूबसूरत है
तो संध्या कितनी हसीँ होगी
ज़िन्दगी के ग़मों खुशियों की
एक नायाब फुलझड़ी होगी
जब आखरी पड़ाव आएगा
रूह से मिलन की घड़ी होगी
आमने सामने साक़ी होगा
परमानन्द की अनुभूति होगी
मै ही स्वं भू हूँगा
जो चाहूंगा सो करूँगा
कठपुतलियों का खेल देख
मै भी ख़ूब हँसूंगा
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कविता में जीवन के अंतिम क्षणों की अनुभूतियों की एक नायाब अभिव्यक्ति और मृत्यु के बाद ईश्वर के साथ एकीकार हो जाने की सनातन विचारधारा के दर्शन होते हैं. बहुत सुंदर.