हँसी Poem by C. P. Sharma

हँसी

जब सुबह इतनी खूबसूरत है
तो संध्या कितनी हसीँ होगी
ज़िन्दगी के ग़मों खुशियों की
एक नायाब फुलझड़ी होगी

जब आखरी पड़ाव आएगा
रूह से मिलन की घड़ी होगी
आमने सामने साक़ी होगा
परमानन्द की अनुभूति होगी

मै ही स्वं भू हूँगा
जो चाहूंगा सो करूँगा
कठपुतलियों का खेल देख
मै भी ख़ूब हँसूंगा

हँसी
Tuesday, May 16, 2017
Topic(s) of this poem: laughter
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 16 May 2017

कविता में जीवन के अंतिम क्षणों की अनुभूतियों की एक नायाब अभिव्यक्ति और मृत्यु के बाद ईश्वर के साथ एकीकार हो जाने की सनातन विचारधारा के दर्शन होते हैं. बहुत सुंदर.

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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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