चमन की बहार Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

चमन की बहार

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चमन की बहार
सोमवार, १२ अक्टूबर २०२०

चमन के अंदर रहूं या बाहर
तेजधूप हो या हलकी सी फुहार
में हमेशा बनता रहा गले का हार
लोग भी देते रहे सबको उपहार।

सदा महकता रहा
लोगों का मनपसंद रहा
जो भी आया मेरी सराहना करता रहा
में भी उनके गले का हार बनता रहा।

दूर से मुझे देखा तो लोग बहेक गए
मेरी खूबसूरती और महकपर आफरीन हो गए
हाथ ने चाहा मुझे पकड ले और जुड़े में डाल दे
पर तुरंत ही ऐसे बिचार को दफनादे।

में कुदरती उपहार हूँ
महकना मेरी आदत है
मेरी भेट कर लोग इबादत करते है
मुझे शरीर पे चढ़ाकर लोग शहादत को याद करते है।

रेगिस्तान मे दिख जाऊं तो चार चाँद लग जाए
गुलिस्तां में दिख जाउ बहार आ जाए
भगवान् की शरण में रख दो तो और खिल जाउ
सब की आँखों में मानो सितारा बन जाउ।

डॉ. जाडिआ हसमुख

चमन की बहार
Monday, October 12, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 12 October 2020

भगवान् की शरण में रख दो तो और खिल जाउ सब की आँखों में मानो सितारा बन जाउ। डॉ. जाडिआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathalal 12 October 2020

भगवान् की शरण में रख दो तो और खिल जाउ सब की आँखों में मानो सितारा बन जाउ। डॉ. जाडिआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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