कुदरत के संगरहो Poem by C. P. Sharma

कुदरत के संगरहो

कुदरत के संगरहो

कुदरतके विचित्ररंग
जीवनमेभरेंऊमंग
मोर पंखकृष्ण संग
भष्मीभूतशिव अंग

हर पल नव जल तरंग
झंकृतचेतन अनंत
जीवनशैलीकेढंग
मानवमनकटीपतंग

प्रकृतीसेनातातोडा
बनप्रकृति काभगौडा
दुख्खोंसे नाताजोडा
फिरे मृग-तृष्णा मे दौडा

स्वै-इच्छा मे भरमाया
स्वै-विवेकखो बैठा
अपनीहीएैठन मे
खुदाईसेहाथधोबैठा

कुदरत मे आहार
कुदरतमे व्यवहार
कुदरतमे स्वास्थ
कुदरतमे उपचार

योगसाधनाकरो
प्रकृतीसे प्यारकरो

कुदरत के संगरहो
Thursday, December 14, 2017
Topic(s) of this poem: love,nature
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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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