मुत्यु का कारण
शनिवार, १९ दिसम्बर २०२०
ये कैसी है विडंबना?
कैसा है मेरे सोचना?
नहीं हो पाता मेरी मर्जी के मुताबिक
हो जाता सबकुछ अचानक।
हो सकता में ज्यादा ही हु आशावादी?
पर ये तो चला आ रहा अनादि!
आदमी के हाथ में सत्ता होती तो क्या ना क्या कर देता!
सबको अपने अधीन करता और गुलाम बना देता।
प्रभु भी ये सोचके हैरान है
सदा रहते परेशान है
मैंने ये कैसा प्राणी बना दिया!
अपने ही पाँव में मैंने कुल्हाड़ी मार दिया।
जब हो हवा का रुख अपने मुताबिक
तो सबको कर दिया अचम्बित
लगा की अब होनेवाली है पिटाई
तो झुका दिया सर और मांग ली दुहाई।
"में एक पामर प्राणी " प्रभु मुझे माफ़ कर दो
"अब की बाद से ये कभी नहीं होगा" दरगुजर कर दो
प्रभु भी पिगल जाते उसकी ये अरज सुनकर
पर वो तो भूल जाता प्रभु की ये महेर बाहर आकर।
"नहीं ये मैंने नहीं लिया" प्रभु की सौगंध खाता हूँ
"गीता पर हाथ रहकर सच बताता हूँ "
"गुरुर से फिर ये कहता है"मैने सब को जाल में फंसा दिया"
अपना शिकंजा दूसरे के गले में लगा दिया
सारी जिंदगी ऐसा ही चलता रहा
अपने ही जाल में खुद फंसकर असहाय रहा
बहुत जमा कर ली पाप की पूंजी
नहीं खर्च कर सका होकर मुंजी!
अब सताने लगा "क्या होगा मेरे मरने के बाद"?
कौन भोगेगा ये सब ऐश्वर्य और जायदाद?
प्रभु के द्वार दे दी दस्तक और मांगी दाद
प्रभु मेरी इतनी सी सुनलो फ़रियाद!
मुझे सुनाई दी गेबी वाणी
"तेरा कर्म तुझे ही भोगना है प्राणी"
जैसी रखेगी करनी वैसे ही होगी तेरी जीवनी
तू ही है मृत्यु का कारण और तू ही बना सकता है उसे संजीवनी।
डॉ जाडिआ हसमुख
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem