चाँद
मैचाँदहूँ
औरचाँदनीसेप्यारकरता हूँ
रातनिकलता
पर अंधेरोंसेमैडरता हूँ
मुझमेंमेराकुछ नही
सूर्याग्नीसेप्रकाशित हूँ
प्रचंडताको सहनकर
शीतल बनाताहूँ
इसीलियेमै
प्यारका प्रतीक बनाहूँ
इसीलिये मै
सागरकी प्रीतबनाहूँ
मुझमेंहीमिलें
सबकोप्रेमहिलोरें
मुझेचूमने ऊछलती हैं
सागर की लहरें
मुझसे
प्रेममधुबरसे
प्रीतमदिरा पी
प्रेमीं पदथिरकें
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एक मधुर कविता. खुबसूरत चाँद व उसका कल्पना लोक. शब्द एक दूसरे से जुड़ गये हैं. कृपया ठीक कर लें.