में मुस्कृता रहूँगा Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

में मुस्कृता रहूँगा

में मुस्कृता रहूँगा
शनिवार, १३ मार्च २०२१

जिंदगी तो बसर हो ही जाएगी
पर अपना रंग जरूर दिखलाएगी
आपको रुलाएगी, हंसाएगी
ओर समय आनेपर अपना जोर भी आजमाएगी।

यदि आज कठिन है
तो कल भी गमगीन रहेगा
ये सोचना भूल है
रंग बद्लना उसका मूल स्वभाव है।

जिंदगी तू है हसीन
और उपर से कमसिन
मुझे कर देती गमगीन
में कैसे बिताऊ अपने दिन?

जरूर सोचा है मैंने
मन से या ना मन से
दुःख नहीं इस बात का
पर तूने रुख किया रात का!

तारे टिमटिमाए
जुगनू भी खूब जगमगाए
पर मेरे पाँव ना डगमगाए
दिल को खूब हचमचाए।

यदि तू रुखपर कायम है
तो मेरा भी एक नियम है
अडिग विश्वास और संयम है
फिर भी तेरी बातो में दम है।

जिंदगी तू करले सितम
पर रहेगी मेरी प्रियतमा
जितना प्यार में तुजसे करता हु
शायद ही इतना आदर दुसरों से करता हूँ।

में मुस्कृता रहूँगा
दिल में कभी गिला नहीं रखूँगा
परखूँगा खूब और आगे निकल जाऊंगा
तेरी हर पहेलियों से खूब निपटूंगा।

डॉ हसमुख मेहता

में मुस्कृता रहूँगा
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
में मुस्कृता रहूँगा दिल में कभी गिला नहीं रखूँगा परखूँगा खूब और आगे निकल जाऊंगा तेरी हर पहेलियों से खूब निपटूंगा। डॉ हसमुख मेहता
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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