मायानगरी- जिंदगी
गुरूवार, १३ मई २०२१
जग है जगतजननी भी है
वातसल्य है आत्मसात करना भी है
आए है दनुया में तो जीना भी है
ना दिल मानते हुए भी दूसरों को अपनाना भी है।
दुनिया में आना ही मात्र काफी नहीं है
सिरग अपने लिए जीना भी नाकामी है
स्वार्थ मे डुबे रहना और छल करना
बात बात में किसी को लज्जित करना भी एक लांछन है।
प्यार ना कर सको तो कोई गीला नहीं
पर छलकपट या वेरभावना का यहाँ कोई काम नहीं
जीत सको तो जित लो दुनियावालों का दिल
सब स्वार्थ से भरे है संगदिल।
यह एक मायानगरी है
जहां सब बाहरी है
सब को प्रहरी बन के रहना है
अपने आप में एक मिसाल कायम करना है।
लूट लो जितना लूट सको
पर याद रहे सबको
साथ में कुछ नहीं ले जाना है
बस प्यार ही साथ में आना है।
जिंदगी को बारबार आके नहीं मुस्कुराना है
एक पथदर्शक के रूप में आपने गुजरना है
जो साथ आए उसे कारवाँ में जुड़ते जाओ
अपने नाम के साथ सार्थकता भी दिखाते जाओ।
मनुष्यजीवन एक वरदान है
प्रभु की और से दिया गया दान है
मान-पान सबकुछ यहां मिलता है
बस जो दिल से यहां जीता है।
डॉ हसमुख मेहता
डॉ.लिट, फेलो
साभार: विजय लक्ष्मी शर्मा 'विजया '
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