वो साथ Poem by Varsha M

वो साथ

Rating: 5.0

पल भर भी ओझल हो जाएं हम
तो मानो जैसे सांस आटक गई हो।।

खाने पर अगर नज़र न आए
तो गरमा गर्मी बहुत है।।

लो अगर लड़खड़ा गए अगर हम कभी
हाथ बढ़ाकर लोकने को तयार सभी।।

और मान लो कभी धोखे से गढ़े में गिर गए अगर
सारा परिवार साथ है हमे खींच निकालने के लिए।।

पल भर के लिखते अकेला क्या
वो तो पोरवाई की रुख भी बदलने के लिए उतारू खड़े।।

न जाने कैसे ये बंधन गहरे हो चले
पर परिवार हमेशा मेरी ताकत बने रहे।।

15.05.2021.

वो साथ
Saturday, May 15, 2021
Topic(s) of this poem: family
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
On the eve of International family day.
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 16 May 2021

Yahi hai sachcha parivaar, sab sath hain dukh mein aur sukh mein.5***

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success