इश्क़ - तोहफा Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

इश्क़ - तोहफा

इश्क़ - तोहफा
बुधवार, १६ जून २०२१

इश्क लिया नहीं जाता
बस वो तो हो जाता है
आपको सपनो की दुनिया में ले जाता है
और स्वर्ग का द्वार दिखाता है।

इश्क़ को बदनाम करना आसान है
तकलीफ का दुसरा नाम बताना भी बेईमानी है
कुदरत की एक नाफरमानी है
मानवजात की एक तरह की मनमानी है

इश्क़ हुआ मानो गुनाह हो गया
किसीसे पनाह लेना मानो दुश्वार हो गया
इश्क़ होने से भूत सवार नहीं होता
आदमी अपने आप का आपा नहीं खोता।

इश्क़ का जूनून इलायदा है
वो वफादारी होने का वादा है
हर कोई इस बातपर आमादा है
पर इश्क़ कोई आपदा नहीं है।

इश्क़ है तो जीवन है
जीवन में मधुरता है
आगे बढ़ने की आतुरता है
पर इसमें समानता भी है।

डॉ हसमुख मेहता
डॉ. साहित्यिक

इश्क़ - तोहफा
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
इश्क़ है तो जीवन है जीवन में मधुरता है आगे बढ़ने की आतुरता है पर इसमें समानता भी है। डॉ हसमुख मेहता डॉ. साहित्यिक
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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