पुलकित हृदय अपना
मानो जैसे आज़ादी पा ली हो
और ये ज़माना नया सा हो गया हो।।
आज़ाद पंछी समान
पंख पसारे छू मंतर हो गए
अनगिनत आशाएं संजोए।।
मानो जैसे कुबेर का खज़ाना हो
लोक बाग की दुआएं हो
अपनो का बेशूमर लड़ हो।।
मानो जैसे सूरज की उगती किरण हो
भरोसे का धीमे धीमे चलना हो
मेरा उनसे मिलना हो।।
पुलकित हृदय अपना
आशिया सुनहरा बुनता चला
खुशियों के ईट की नीव डालते हुए।।
कौन जाने किस मोड़ पे,
सच हो जाएं ये सपने सुहावने
और चमक उठे चांद सितारे गर्दिश में आपने।।
कौन जाने हम भी हो चले
आपने इस प्यार में यूं पागल
की ज़माना भी हमे कहे आशिक़ अव्वल।।
नाचीज़ था नहीं इस लायक एक दम
मगर इश्क़ ने कर दिया काया कल्प
और मैं बन गया दमा दम मस्त कलंदर एक दम।।
एड२९.०६.२०२१
वर्षा मधुलिका
Ishq has the power to transform oneself. Keep loving and keep sharing. Lovely Kavita.
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Thank-you ma'am for encouraging