कायनात का बुना हुआ ये अनमोल पल Poem by Varsha M

कायनात का बुना हुआ ये अनमोल पल

Rating: 5.0

रक्त की नालियों में दौड़ता वो ख़ून
चीख चीख कर गा रहा ये रुदन
हाय मैंने किसकी गलियां कर दी सुनसान।।

चाहा था दिलसे जिसको मैंने हरदम
आज वो पल आया जब मिलने वाले थे हम
और लो ये क्या गजब बवाल उठ खड़ा हुआ इस पल।।

तूफानी आतंक का केहर बरस रहा वज्र के समान
मानो जैसे साक्षात दानव ने धर दी हो अपने चरण कमल
मसलते हुए नन्हें कोमल घास के लड़ियों को इस पल।।

कराहने के गहन रुदन, कर्ण में कर रहे भजन
और मेघों का ये विजय बंदना कर रही गुंजन
लो आ ही गया ये सावन का मधुर लगन।।

पकड़े नयन की बहती बेधार नदि की लगाम
मैं चली करने अपने सजन के आंगन को बहाल
थोड़ी घबराई, थोड़ी सहमी, थोड़ी खोई खोई।।

ओ! पगला मन सुन ले ध्यान से सरगम
मध्यम मध्यम कोमल पवन के चुंबन समान
चुरा ले जा रही मेरे दिल का विभोर चैन।।

एड ०२०७२०२१
© वर्षा मधुलिका

कायनात का बुना हुआ ये अनमोल पल
Friday, July 2, 2021
Topic(s) of this poem: happiness,joy,peace
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
Spirt finds its body always. Photo courtesy pinterest.
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 07 July 2021

meethe dard ka ehsaas: मध्यम मध्यम कोमल पवन के चुंबन समान चुरा ले जा रही मेरे दिल का विभोर चैन।। Bhaut khoob 5**

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