नहो था मालुम Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

नहो था मालुम

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नहो था मालुम
बुधवार, २३ मार्च २०२२ र

नहीं था मालुम
कहाँ मुझे जाना है?
कैसे रहना
और कैसे जीना है?

मैंने पकड़ी
आसान सी राह
ना मरना ओर मारना
सफर को पूरा करना।

ना किसीसे बैर
ना किसीको समजा गैर
पर चल नहीं पाया
नींद नहीं, चेन नहीं आया।

दुनिया में सब कुछ, नहीं मिलता
नहीं मिलता तो, पलती कटुता
बन जाती कहानी और वारता
यही कोई अकारण, नहीं मरता

हाथ पसारे, मंन्ते मानी
किस्मत ने भी, हार मानी
मैंने दिल को भरोसा दिलाया
उसने मुज को, बहुत रुलाया।

भले रही मेरी, राह कठिन
हर पल बिता, चिंता से मुश्किल
कैसा होगा आनेवाला कल?
कभी ना टूटेगा, जीवन का जाल

रहो बेफिकर, चलते रहो
अपनी मौज में, मस्त रहो
कभी ना होंसले, तुम्हारे परस्त
सूरज का हो उदय, कभी ना हो अस्त

रहना खुश, रखो उसुलो
रह कठीन हो बस चले चलो
इरादा अपना, पक्का करलो
चाहोतो जीवन से, समजौता करलो।

डॉ. हसमुख मेहता
साहित्यिकी

नहो था मालुम
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
रहना खुश, रखो उसुलो रह कठीन हो बस चले चलो इरादा अपना, पक्का करलो चाहोतो जीवन से, समजौता करलो। डॉ. हसमुख मेहता साहित्यिकी
COMMENTS OF THE POEM
Dillip 22 March 2022

Shithouse poem.

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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