चलो तूफ़ान का सामना करे.... Poem by M. Asim Nehal

चलो तूफ़ान का सामना करे....

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फिर तूफ़ान ने दस्तक दी
फिर आशियाना बिखर गया
तिनके का था, तिनका बन रह गया
कैसे कैसे सपने थे, क्या क्याअरमान थे
हवा को क्या पता, उसने तो चल जाना था

नहीं रहता सब एक जैसा,
किसे पता कहाँ ठिकाना है
राही है सब, राह है कई कई,
किस ओर ले जाये ज़िन्दगी
किसे पता है? किसने जाना है?

अब तो दरो-दीवार भी अनजाने लगने लगे
जाने पहचाने चेहरे भी बेगाने लगने लगे
गुज़रते थे जिन राहों से शमो-सेहर
वो भी अब देखो तो कुछ धुंधलाने लगे

चलो फिर कोई मक़ाम तलाश करे
चलो फिर नया आशियाना तामीर करे
तिनकों की कमी नहीं इस जहान में
चलो तूफ़ान का सामना करे

Thursday, July 7, 2022
Topic(s) of this poem: journey
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