कफ़न को याद रखना
शनिवार, १७ अप्रैल २०२१
कफ़न को याद रखना
ये है जीवन का नजराना
अंतिम समय की एक सफर
तुम्हे याद रखना है मुसाफिर।
दुनिया से तुम्हे मुंह बंध रखना है
अपने बोल को तोल के बोलना है
हर बोल की एक वजह होती है
दुनिया उसकी कदर करती है।
दुनिया में आए है तो जाना भी है
पर उसके पहले नाम भी कमाना है
समय बिलकुल ही नहीं गंवाना है
जबानपर टाटा का ताला लगाना है।
यहाँ सब के लिए सामान्य माहौल है
पर आज स्थिति डावांडोल है
हर आदमी के मुँहपर चिंता की लहर है
मोत के साया का बड़ा कहर है.
जीते जी मुँहपर ताला लग गया है
जीना दूभर सा हो गया है
किसी से मिल नही सकते
हाथ मिलाने लो भी परहेज करते।
सब कहते है है
पाप की पराकाष्टा हो गई है
मनुष्य मनुष्य के खून का प्यासा हो गया है
आज दुश्मन 'कोरोना'आप पर हावी हो गया है।
इलाज के लिए भी कतारे
मरने के बाद भी दिखाते तारे
स्मशान मे भी एक के बाद एक आते
अपना नंबर कतार में आनेपर जलाते।
राशन की लाइन का तो सूना था
रेल में सफर के लिए भी मुश्किल था
रेस्टॉरेंट में भी अक्सर लाइन का अनुभव था
मरने के बाद का खौफनाक नजारा अकल्पनीय था।
ये महामारी सब के एक सबक दे जाएगी
कुदरत को नहीं मानोगे तो रास्ता दिखाएगी
कोई दवा नहीं मिल पाएगी और सवर्गारोहण हो जाएगा
आपके देह को अग्नि के हवाले किया बिन गड्डे में फेंक दिया जाएगा
यदि यही है आपका आखिरी अंजाम
पहले से ही करलो अपना इंतजाम
ट्रैफिक में हमेशा लगा रहेगा जाम
मरता रहेगा, तड़पता रहेगा आदमी आम
डॉ हसमुख मेहता
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