जिंदगी तुम धूल सरीखीहो गई Poem by Kezia Kezia

जिंदगी तुम धूल सरीखीहो गई

Rating: 5.0

जिंदगी तुम धूल सरीखीहो गई

जितना झाड़ती हूँ

पल्ले पड़ ही जाती हो

जब मैं शाँत बैठती हूँ

तुम शोर मचाती हुई

मुझ तक पहुँच ही जाती हो

जितना कमतर तुम्हे आँकती हूँ

आँखों में गिरकर

तिलमिलाहट दे ही जाती हो

लेकिन हर पल पास होकर

एक नायब रिश्ता निभाती हो

मैं तुम्हे चाहूँ या न चाहूँ

मैं तुम्हे चुनूँ या ना चुनूँ

तुम मुझे चाहती ही नहीं

चुनती भी हो

फिर भी पूछती हूँ

जिंदगी तुम धूल सरीखी क्यों हो गई

***

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 18 August 2020

अद्वितीय अभिव्यक्ति. ज़िन्दगी साक्षी भी है और साक्ष्य भी है. हमारा भला बुरा ज़िन्दगी के आईने के द्वारा हमें दिखाई देता है. ज़िन्दगी हर स्थिति में हमें सहारा भी देती है क्योंकि उसका भी हमारे सिवा कोई नहीं है. धन्यवाद.

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Sharad Bhatia 18 August 2020

बहुत बेहतरीन रचना दिल खुश हो गया पढ़कर आभार

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