दस्तक1 Poem by Varsha M

दस्तक1

Rating: 5.0

वो जो वक्त हमने
बिताए थे साथ साथ
याद आते हैं हरपल।।

वो जो तुम मेरी
कविता की बोल बन जाते
याद आते हैं हरपल।।

और वो में जो बनती
तेरी सरगम की ताल
याद आते हैं हरपल।।

याद आते हैं हर वो पल
जब ये यादें देती हैं दस्तक
मेरे मन के द्वारे हरदम।।

वो यादें हरी भरी
मुस्कान से खिली हुई
मानो मुझे आवाज़ दे रही।।

ओ राही! किधर भूले जा रहे
सुनहरा सावन तो इधर हो रहा
और आप मुंह मोड़ रूठे चले जा रहे।।

ठहर जाओ ओ! मुसाफिर अंजान
न जा मुंह मोड़ ओ मेरे हमसफर
अब तो मिले हम दिन दोपहर।।

कमल के फूल समान अनमोल
भगवान के शीश शैय्या बने तुम
दूर होते हुए भी पास बने रहे तुम।।

गगन की गुनगुनाहट को
महसूस करते झिलमिल सितारों में
मानो जैसे संगीत गोष्टी में मंत्रमुग्ध मनवा मेरा।।

और पवन की कश्ती में सवार
क्षितिज की सैर कर आए हम बराबर
रोम रोम खिलते हुए बगान के फूल समान।।

एड३००६२०२१
वर्षा मधुलिका

दस्तक1
Wednesday, June 30, 2021
Topic(s) of this poem: emotions,life
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
We all get knocks do we attend to it. Photo courtesy pinterest.
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 15 July 2021

5 Stars ******

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M Asim Nehal 15 July 2021

Reminded me a couplets by Late Rahat Indori: किसने दस्तक दी ये दिल पर कौन है, आप तो अंदर हैं बाहर कौन हैः...

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