गुम हम - 2 Poem by abhilasha bhatt

गुम हम - 2

गुम हम
गुम तुम
अधूरे से हम
पूरे कहीं तुम
ख़ामोश हम
कहीं चुप में गुम
भीड़ में तुम
दुनिया की गुम
पीछे रह गए
वहीं हम
आगे बहुत
कहीं तुम
अब सब है चुप
कहीं शून्य में गुम
याद में अब भी तुम
रहते हैं साथ हम
खफ़ा हुए हमसे तुम
यूँ हो गए कहीं गुम
साथ में वहीं हम
इन्तजा़र में मरे कभी तुम
ख्वाबों की दुनिया में कहीं गुम
अब भी हम
वहीं हैं गुम
अब किसी के हो तुम
ख्यालों की धुन
वहीं तन्हा कहीं हम
कहीं चुप में
हैं गुम हम
मुझमें बाकी अब भी
उसी तरह से हो तुम
बस यहीं हैं हम
दूर बहुत कहीं हो तुम
दिन रह गए हैं अब कम
पास मेरे हमदम
बस खोए हैं हर पल
उम्मीद में कहीं गुम
हकीकत में सब कम
सब है अब गुम
कहीं तुम
कहीं हम

Monday, April 24, 2017
Topic(s) of this poem: lost
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