A-058. चीखते चिल्लाते Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-058. चीखते चिल्लाते

चीखते चिल्लाते 17.4.16—11.28 AM

चीखते चिल्लाते ढोल वोल पीटते
साजों को सजाते स्वरों को घसीटते

सुरों के संगम में लगे सुरों को ही ढूँढ़ते
कभी निहार लेते तो कभी आँखें मूंदते

बची खुची कसर नृत्य से निकालते
ऊँचे ऊँचे स्वर में उसको भी ढालते

इतने ऊँचे स्वर में किसको हैं पुकारते
वो बहरा हो गया या खुद को बघारते

आसमान भेद कर उसतक हमें जाना है
बात न रह जाये कोई उसको बताना है

खुदा तक पहुँचने की मुकम्मल तैयारी है
रह न जाये कसर कोई फितरत हमारी है

कोई बूढ़ा है बीमार है उसका किरदार है
सज़ा तो भुगतनी है उसका वो हक़दार है

नींद कहाँ उड़ती है आगे कहाँ सोते हैं
झपकी आ जाये तो किश्तों में होते हैं

सारा साल पढ़ते नहीं कितने बहाने है
आज ही उसने सारे सवाल निपटाने हैं

पास होना है तो आशीर्वाद तो चाहिए
प्रभु के चरणों में नमस्कार तो चाहिए

नींद न आयी के बहाने लोग रो रहे हैं
सोने वाले तो पंडाल में भी सो रहे हैं

शिकायतों को लेकर बुजुर्ग ही आएगा
अंतिम वक़्त यही बुजुर्ग भी पछतायेगा

अपना सगा कोई जब सो नहीं पाएगा
तब यही इंसान दूसरों को समझाएगा

छोटी सी आवाज भी इसको तड़फायेगी
तब कहीं इसको ये बात समझ आएगी

'पाली' तुम प्रभु का जी भर गुणगान करो
इससे पहले दूसरे इंसान का सम्मान करो…..
इससे पहले दूसरे इंसान का सम्मान करो…..


Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'

A-058. चीखते चिल्लाते
Sunday, April 17, 2016
Topic(s) of this poem: motivational
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