A-139. वो पगली है Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-139. वो पगली है

वो पगली है 6.7.16—5.53 PM

वो पगली है मुझसे प्यार करती है
हर पल वो दो टूक निहार करती है
उसकी नज़र मेरा इंतज़ार करती है
मौन रहती है और इकरार करती है

सपने सिंगार किये रोज चली आती है
मेरे सपनों में आकर मुझे ही सताती है
खुद सोती नहीं और न ही सोने देती है
करना कुछ भी नहीं बस जान लेती है

शरारत उसके तन बदन से झलकती है
लहरा के चलना भी क्या खूब फब्ती है
मचल के चलना और मचल के उठना
उठ कर मुस्कुराना क्या खूब जचती है

कभी मुस्कुराती है मौन हो जाती है
कभी शरारतें करती जान खाती है

मौन होती देखीं है उसकी निगाहें
नीर भरी आँखें भी दिखती हैं गाहें

पलकें बेजान हो लुढ़क जाती हैं
दर्द लिए हैं फिर भी मुस्कराती हैं

जिद्द करती है अपनी बात मनाने की
उसकी सारी तड़फ है मुझे पाने की
रूठ गयी है ज़िद्द है मुझमें समाने की
कोई तरतीब नहीं है उसे समझाने की

उसकी बेताबी वो मेरे करीब आने की
करीब आने की और मुझमें समाने की
सीने से लगकर अपनी बात बताने की
नज़रें मिलाकर अपना प्यार जताने की

वो पगली है मुझसे प्यार करती है
हर पल वो दो टूक निहार करती है

Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'

A-139. वो पगली है
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 07 July 2016

Wah wah kya baat hai, Bahut khoob.

1 0 Reply
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