A-321 वक़्त का आइना Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-321 वक़्त का आइना

Rating: 5.0

A-321 वक़्त का आइना 3.10.17- 9.09 AM

वक़्त का आइना तुमने कभी देखा है
कितने रिसते हुए ज़ख़्मों का लेखा है

मोहब्बत की दास्ताँ का अपना भ्रम है
प्यार का रस है अपना अपना करम है

रिश्तों को उसने क्या ख़ूब निभाया है
ऐसा हक़ तो केवल उसी ने जताया है

प्यार के शब्दों को न कभी मिलाया है
जब शब्द टूटा शब्दों से ही निभाया है

जानते होते ज़ख़्मों की रिसने की रवायत
सम्भल जाते न करते कोई नयी क़वायत

न दर्द सहने पड़ते न उनका तजुरबा होता
ख़ून रिसता तो क्या सिर्फ अजूबा होता

सोया होता है आलम तो हम जागते हैं
प्यार क़समें वादे भी हम ख़ूब जानते हैं

दूरी इतनी कम कि हवा भी संकोच करे
हवा की तंगदिली भी रह रह विनोद करे

रिश्ते निभाना तलवार की धार खेलना है
जिंदगी की कश्मकश और दंड पेलना है

ज़िंदगी निडर है या जिंदगी भी जज़्बात है
जीना भी एक कला है या एक करामात है


Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"

A-321 वक़्त का आइना
Tuesday, October 3, 2017
Topic(s) of this poem: love
COMMENTS OF THE POEM
Kumarmani Mahakul 03 October 2017

Perception of life is amazingly and beautifully reflected well in this amazing poem. Brilliant presentation makes this special...10

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success