आग भड़के, शोले भड़के.. Aag Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

आग भड़के, शोले भड़के.. Aag

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आग भड़के, शोले भड़के
Tuesday, December 17,2019
10: 09 PM

आग भड़के, शोले भड़के
लोग चले घूमने सुबह तड़के
देखा आगजनी कर रहे लड़के
हमने दौड़ लगायी ना देखा मुड़के।

राजकारणी कर रहे अपना उल्लू सीधा
हर चीज़ में डाल रहे बाधा
लोग मरते है तो मरते रहें
बस हमारी रोटी पकती रहे।

गांधीजी कह रहे थे "पार्टी की अब जरुरत नहीं "
फिर भी सत्ता का नशा उतरा नहीं
पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही दास्ताँ
बस अब तो रुकना ही है कारवां।

देश का बुरा हाल बना रखा
हर जगह सबकी हालत है खस्ता
हर कोई धर्म के नाम पर झूझ रहा
इंसानियत का खून बहा रहा।

फोगट मे खाने की आरजु बढ़ गयी है
हर चीज़ में मुनाफाखोरी आ गयी है
बसों में मुफत सवारी, बिजली -पानी सब मुफ्त
बस देश को रखो अपनी गीरफ़त।

हम कर देंगे दाना पानी सस्ता
बस एक बार दे दो सत्ता
फिर तो आप ही आओगे हमें देने
हम तुम देंगे चने चबाने।

घर अपना सम्हलता नहीं
चले देश की फ़िक्र करने
कितने सड़ रहे है जेल में
फिर भी सत्ता का नशा है दिल में।

हसमुख मेहता

आग भड़के, शोले भड़के.. Aag
Wednesday, December 18, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 18 December 2019

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Mehta Hasmukh Amathalal 18 December 2019

welcoem , ashok kumar Edit or delete this Like · Reply · 1m

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Mehta Hasmukh Amathalal 18 December 2019

घर अपना सम्हलता नहीं चले देश की फ़िक्र करने कितने सड़ रहे है जेल में फिर भी सत्ता का नशा है दिल में। हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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