आज नहीं रह गई... Aaj Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

आज नहीं रह गई... Aaj

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आज नहीं रह गई
रविवार, ९ फरवरी २०२०

मैंने कहा "कहती रहो"
बस आँखे बंध रखो
कहती जाओ बिंदास
हाजिर है इधर आपका दास।

आज नहीं रह गई वो बाते
नारी को लोग जरूर सताते
पर आज उस बारे में विचारते
भावुक हो जाते है कहते कहते।

आज रूप बदला है
रूह को तो जलाता है
सब बातें सुनकर कल की आज की
बस नत -मस्तक हो जाते है इज्जत कर के नारी की।

वो कहती गई, सिसकियाँ लेती गई
मुझे भी साथ में रुलाती गई
"बस कर अब "मैंने उसका हाथ पकड़ लिया
"साथ निभाउंगा जीवनभर "यह भी कह दिया।

जो हो गया वो परछाई सा है
जो हो रहा है वो बुरा सपना सा है
पर आनेवाला कल तो अपना है
सजना और संवारना है।

बस यही दुआ है
कोई जवाब नहीं जो हो गया है
बस आज तो हम एक है
एक ही मंझिल और एक ही ख़्वाब है।

हसमुख मेहता

आज नहीं रह गई... Aaj
Sunday, February 9, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 10 February 2020

Rajkumar Soni Shadewadha 5 mutual friends 1 Edit or delete this Like · Reply · 1m

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Mehta Hasmukh Amathalal 09 February 2020

बस यही दुआ है कोई जवाब नहीं जो हो गया है बस आज तो हम एक है एक ही मंझिल और एक ही ख़्वाब है। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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