अकेली चाह से कुछ नहीं बनता
भागते रहे तुम जिस्मानी सौंदर्य के पीछे
जिसके छींटे लगते रहे नाम के पीछे
बेकार में बदनामी झेलते रहे
बस जीस्म के साथ खिलवाड़ ही करते रहे।
हर कोई जान ने लगा आप क्या है?
आपके जीवन में प्रेम का वास्ता क्या है?
किसी को विश्वास नहीं आ रहा आपके लब्ज़ो पर
सब चुराने लगे नजरे आपके कर्मो पर।
जैसे शराबी पिता है अमृत पेड़ के नीचे
भले ही वो निकाले बोल सच्चे
उसको लोग इसनासियत के नामपर कहेंगे धब्बा
सब लोग कहेंगे नहीं जायेंगे उसके पास 'नारे बाबा '
आरज़ू के साथ सही मंशा आवश्यक है
यदि आदमी खरा और वयस्क है
कुछ चीजें अपने आप बयाँ हो जाती है
ना कहने की चाह हो फिर भी होठों पे आही जाती है।
दिल चाहता हो आसमान लांगने को
चाँद के साथ मस्ती करने को और प्रेम करने को
पर अकेली चाह से कुछ नहीं बनता
आदमी को अपने आप सके अनुरूप ढालना पड़ता।
x welcoem pooja oberoy Unlike · Reply · 1 · Just now 1 Dec by
welcome Rajesh Labana Unlike · Reply · 1 · Just now
welcome patel parth Unlike · Reply · 1 · Just now
welcome yadvendra ahir Unlike · Reply · 1 · Just now
xad arvind jain Unlike · Reply · 1 · Just now 1 Dec by
xmanzar abbas rizvi Unlike · Reply · 1 · Just now 1 Dec by
xMadan Mohan Saxena 2016-12-01 8: 31 GMT+05: 30 Hasmukh Mehta [ [email protected]]: Unlike · Reply · 1 · 4 hrs 1 Dec
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x welcoemvijay palwal Unlike · Reply · 1 · Just now 1 Dec by