कब बदलेंगे ये हालात ।
कब देंगे नफ़रत को मात।
अपने वतन की फ़िक्र नहीं है
पर करते हैं, मन की बात।।
मुल्क से बाहर रहने वाले,
साथ में लाएंगे सौग़ात।।
वक़्त पे ही बतलाएंगे हम,
किसकी, कितनी है औक़ात।।।।।।
किसको किसको समझाएंगे
एक धर्म में, कई है ज़ात ।।।।।
क़ुदरत का ये खेल है भईया
दिन गुज़रा तो हो गई रात ।।।।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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