हमको रोज़गार दो, ये नहीं के मार दो। Poem by Anjum Alinagari

हमको रोज़गार दो, ये नहीं के मार दो।

हमको रोज़गार दो।
ये नहीं के मार दो।

हम वतन के ख़्वाब हैं।
ज़ुल्म के जवाब हैं।

हम खुली किताब हैं।।
हम ही इंकलाब हैं।।।
हम तो लाजवाब है।
शम्स , आफ़ताब है।।।
काम देकर ज़िंदगी,
तुम मेरी सवार दो।

यह नहीं के मार दो ।।
हम को रोज़गार दो।।।

कह दो ज़िम्मेदार को।
कह दो चौकीदार को।
झूठ बोल बोल कर,
वक्त न गुज़ार दो ।।

हमको रोजगार दो।।
ये नहीं के मार दो।।

देश का न पूछिए,
देश अश्कबार है।
दिल ये तार तार है,
तेल सौ के पार है।।।
ज़ालिमों के ज़ुल्म से,
देश ये बीमार है।।
नफ़रतों के बीच में,
प्यार का पहाड़ है।।
प्यार के पहाड़ को,
कौन अब हिलाएगा,

हम सभी की मांग है।
जो न उट पटांग है।
मक़सद ए हयात है।
ये रीज़्क़ काएनात है।।
इसलिए तो कह रहा
ज़ुल्म जो है सह रहा ----
हम को रोज़गार दो,
ये नहीं के मार दो।।

©अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Monday, July 6, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,urdu,hindi,poems,democracy,intention,education,youth,wake up call
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रोज़गार इस मुल्क अहम ज़रूरत है।
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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