वतन को बचा लो क़लम के सिपाही Poem by Anjum Alinagari

वतन को बचा लो क़लम के सिपाही

वतन को बचा लो, कलम के सिपाही।
जिन्हें कुछ न आता, हैं खाते मलाई।

ये दिल कह रहा है, ये हालत है कहती।
अगर हम न होते, तो दूनियाॅ न होती।
कहाॅ हम खड़े थे , कहाॅ जा रहे हैं।
हर एक मोड़ पे दर्द व ग़म पा रहे हैं।

गरीबों की दुनिया ऊजड़ सी गई है।
ये ज़ुल्मों सितम से ये नफरत बढ़ी है।

जिधर देखता हूॅ, ऊधर है बुराई।
शहर गाॅव टोले में हर सू लड़ाई।

वतन को बचा लो- - - - - - -

अक़ल से जो अंधे, हैं नादान कोडे।
वो रिश्तों के बंधन, को पल भर में तोड़े।
सियासत के रहबर का, उनसे है नाता।
जिन्हें लिखना पढ़ना, बहुत कम है आता।
ऊठो तुम ये गफ़लत में, क्यो सो रहे हो।
ज़मीं आसमा ये ज़हाॅ खो रहे हो।
जगो और सब को जगाओ कलम से।
धनी-आदमी है, ये ईल्मो हूनर से।

पढ़ो मेरे भाई , बढ़ो मेरे भाई ।
वतन को बचा लो, कलम के सिपाही।।।

रचना एंव लेख: - 'अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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