धनतेरस की खुशयां हैं, और दिवाली की धूम।
चलो लिखें सब हिन्दू, मुस्लिम, मिल कर एक मज़मून।
प्यार ओ उल्फत की धरती से, नफरत हमें मिटाना है।
जन्नत सा हो अपना ये घर, वो माहौल बनाना है।
थी जो एक तहज़ीब हमारी , उससे बचाना है।
मासूमो पे ज़ुल्म न होवे क़सम ये खाना है।
मज़हब की आज़ादी है, फिर मज़हब पे क्यों वॉर हुआ !
कहती है आज़ादी अब तक, मेहनत सब बेकार हुआ।
ज़ात पात पे बाँट रखा है, गद्दी के मतवालों ने।
देश को लुटा, , , , , , खूब है खाया, , , , , अब तक इन्ही दलालों ने!
सरहद पे वो वीर खड़े हैं, हर मुश्किल से लड़ने को!
हम भी हैं तैयार सिपाही, तेरे साथ ही मरने को!
दर्दे दिल लिखता है अंजुम, , , सच्ची बात बताने को!
तरस रहे हैं, , , , , , आज देश में, लाखों , बच्चे खाने को!
रचना-अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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