जो ओहदे को पाकर के मग़रूर हैं, ज़मीं की सतह से बहुत दूर हैं। Poem by Anjum Alinagari

जो ओहदे को पाकर के मग़रूर हैं, ज़मीं की सतह से बहुत दूर हैं।

जो ओहदे को पाकर के मग़रूर हैं।
ज़मीं की सतह से बहुत दूर हैं।

समझते हैं मुझ सा है कोई नहीं,
वही जो के सरकारी मज़दूर हैं।

बीना काफ़िला के चलेंगे नहीं,
वो साहब जो आदत से मजबूर हैं।

जो करते हैं कुछ, और दिखाते हैं कुछ,
वही इस ज़माने में मशहूर हैं।

भले बात बैठाकर मिठी करें,
ज़ेहन से है लगता कि माज़ूर हैं।

© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Saturday, July 4, 2026
Topic(s) of this poem: ghazal,urdu,hindi,indian
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
जो कोई पद पर रहते हैं वो दुसरों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वो जल्दी लोगों के बीच नहीं जाते, लोगों से कटे छटे रहते हैं।
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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