जो ओहदे को पाकर के मग़रूर हैं।
ज़मीं की सतह से बहुत दूर हैं।
समझते हैं मुझ सा है कोई नहीं,
वही जो के सरकारी मज़दूर हैं।
बीना काफ़िला के चलेंगे नहीं,
वो साहब जो आदत से मजबूर हैं।
जो करते हैं कुछ, और दिखाते हैं कुछ,
वही इस ज़माने में मशहूर हैं।
भले बात बैठाकर मिठी करें,
ज़ेहन से है लगता कि माज़ूर हैं।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem