अपने हक़ के लिए सड़कों पे उतरना होगा।
बाँध के सर पे कफ़न घर से निकलना होगा।
नफ़रतो की ये सयासत को हरानी होगी।
इस चमन में वो फ़िज़ा फिर से बनानी होगी।
वो जो कहते हैं चले जाओ वतन है मेरा।
उनसे बस पुछलो इस देश में क्या है तेरा।
इनकी औक़ात बतानी है तो आओ आगे।
मुल्क व मिल्लत ये बलिदान है फिर से मागे।
नौजवाँ मुल्क के, तुम सब को बदलना होगा।
अपने हक़ के लिए सड़कों पे उतरना होगा।
वक़्त कहता है ख़बरदार जो ख़ामोश रहे।
अमन और प्यार लिए, जज़्बा जनू जोश रहे।
तेरे आबा ने ज़माने को सबक़ सिखलाया।
फिर भी ज़ुल्मत का तेरे सर पे है छाया साया।
भूखे प्यासे ही सही, अब धूप में जलना होगा।
अपने हक़ के लिए , सड़कों पे उतरना होगा।
रचना&लेख: - अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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