क्या है जहां में, कुछ भी नहीं ज़ुल्म के सिवा। Poem by Anjum Alinagari

क्या है जहां में, कुछ भी नहीं ज़ुल्म के सिवा।

क्या है जहां में, कुछ भी नहीं, ज़ुल्म के सिवा।
तुफ़ान बन न जाए कहीं, नफ़रती हवा।

नफ़रत की बीमारी से, ये बीमार वतन है।
इलाज है मंहगा यहां , और सस्ता कफ़न है।।
कौड़ी से भी सस्ती है, यहां जान की क़ीमत।
पामाल होती रहती है, इस मुल्क की अज़मत।

मिल जुल के वतन के लिए, हम सब करें दुआ।
तुफ़ान बन न जाए कहीं, नफ़रती हवा।।

लगता है वो तारीख़ मिटाने पे तुला है।
कह दो उन्हें कि बाक़ी, अभी लाल क़िला है।
हम को है मिली प्यार, मुहब्बत की विरासत।
तुम को है मिला, ज़ुल्म और नफ़रत की सियासत।

नफ़रत के मर्ज़ का करें, इलाज और दवा ।
तुफ़ान बन न जाए कहीं, नफ़रती हवा।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Tuesday, September 15, 2026
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
भारत को नफ़रत से आज़ाद कराने की ज़रूरत है
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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