हवा कह रही है, फ़िज़ा कह रही है।
ये आलूआदगी की वबा कह रही है।
ये अँधेरे धुएं का बदल सा पहरा।
ये दिल्ली को दिल की सदा कह रही है!
शजर तुम लगाओ न कचरे जलाओ!
खोदाया ख़ुदी पे ज़रा रहम खाओ!
ये ज़हरीली कल से हवा बह रही है।
ये आलूआदगी की वबा कह रही है!
जो गाड़ी का पेट्रोल , डीज़ल जलेगा।
तो धुंआ यक़ीनन हवा में मिलेगा।
परेशानियां होंगी हर एक बशर को।
बचा लो मेरे भाई , अपनी शहर को।
ये दिल्ली की प्यारी अदा कह रही है।
ये आलूआदगी की सदा कह रही है!
रचना &लेख: - अंजुम अलीनगरी, दरभंगा, बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem