हां ये है जामिया, हां ये है जामिया Poem by Anjum Alinagari

हां ये है जामिया, हां ये है जामिया

शानो-शौकत से लबरेज़ , उल्फ़त की देन।
देख कर जिसको मिलता सकूं और चेन।
जिसकी तासिस से जगमगाया जहां ।
हाँ ये है जामिया, हाँ ये है जामिया।

खुशनुमा है मुहब्बत की ये सरज़मी।
दूर करती है पल भर में, ये हर कमी।
इल्म का ये क़िला , हिन्द में शान है।
हक़ और हक़दार की अपनी पहचान है।
गुल इस गलशन का दुनिया में मशहूर है।
नफ़रतों की फ़िज़ा से, बहुत दूर है।
जिसको मालूम है हर जिम्मेदारीयां
हाँ ये है जामिया, हाँ ये है जामिया।

इसकी महफिल से, दुनिया को खुश्बू मिली।
इल्म की इस ज़मी से हवा जब चली।
इश्क ने इसके सींचा , बड़ा कर दिया।
अपने पैरों पे मुझ को , खड़ा कर दिया।
इसके बानी का हम सब पे एहसान है।
इसके हक़ के लिए जान क़ुर्बान है।
उससे कह दो निकाले न कुछ ख़ामियां।
हाँ ये है जामिया, हाँ ये है जामिया।
रचना&लेख: - अंजुम अलीनगरी

Thursday, July 2, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,urdu,hindi,indian
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Jamia Millia Islamia University, New Delhi की ख़ुबी‌‌ को बयां करती हुई मेरी नज़्म
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Alinagar, Darbhanga
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