सुनों राहगीरों संभल कर के चलना।
दुआ माँ की लेकर के घर से निकलना।
कोई कुछ भी दे उसको खाना न हरगीज़।
कहाॅ जा रहे हो बताना न हरगीज़।
है इंसानियत फ़र्ज़ इसको समझना।
सफ़र में किसी से कभी मत उलझना।
ये अख़्लाक़ अपना कभी न बदलना।
सुनों राहगीरों संभल करके चलना।
बहस से बचो , न ही झगड़ो किसी से।
जहां सोओ बैठो, रहो तुम खुशी से।
अदब क्या है, किरदार कह दे बता दे।
हंसाते चलो सबको अपनी हंसी से।
जो आ जाए ग़ुस्सा तो उसको निगलना।
सुनों राहगीरों संभल कर के चलना।
© अंजुम अलीनगरी दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem