सुनों राहगीरों संभल कर के चलना । Poem by Anjum Alinagari

सुनों राहगीरों संभल कर के चलना ।

सुनों राहगीरों संभल कर के चलना।
दुआ माँ की लेकर के घर से निकलना।

कोई कुछ भी दे उसको खाना न हरगीज़।
कहाॅ जा रहे हो बताना न हरगीज़।

है इंसानियत फ़र्ज़ इसको समझना।
सफ़र में किसी से कभी मत उलझना।

ये अख़्लाक़ अपना कभी न बदलना।
सुनों राहगीरों संभल करके चलना।

बहस से बचो , न ही झगड़ो किसी से।
जहां सोओ बैठो, रहो तुम खुशी से।

अदब क्या है, किरदार कह दे बता दे।
हंसाते चलो सबको अपनी हंसी से।

जो आ जाए ग़ुस्सा तो उसको निगलना।
सुनों राहगीरों संभल कर के चलना।
© अंजुम अलीनगरी दरभंगा बिहार

Thursday, July 9, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,traveling,student,labour,feeling,affinity and love,indian,youth,spirit
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
सफ़र की कहानी है, हिदायत है, परेशानी है ।
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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