लाइट जलेगी इल्म की फिर से, मेरे गांव की बस्ती में।
मर्द ए मुजाहिद होंगे रहबर, होगी पढ़ाई सस्ती में।
दादाजी के दिल का फूल, जन्नत में खिल जाएगा।
इल्म का मर्कज़ जब अपना ये अलीनगर बन जाएगा।
बोग़ज़ व अदावत, नफ़रत किना, हो जाएगा दूर ।
आई है जन्नत से सदा, ये कहते हैं मंज़ूर।
जैन, हसन, फरीद ने मिलकर, पहली ईंट रखी है
हर अख़बार में पढ़ कर जाना, अच्छी बात लिखी है ।
ख़्वाबों को ताबीर मिली है, इसमें बहुत नफ़ा है।
इल्म को बांटो नहीं घटेगा, इसमें बहुत शिफ़ा है।
सारी उम्र का सदक़ा है, इल्म का गौहर देना ।
पूरी लगन से बच्चे सिखें, इल्म है उसका गहना।
दुआ ये अंजुम का शामिल है, नाम बड़ा ये पाए ।
यहां से जो बच्चा निकले वो, दुनिया में छा जाए ।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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