बोलो, जय जय हो मध्याह्न। Poem by Anjum Alinagari

बोलो, जय जय हो मध्याह्न।

बच्चे आते, बैठ के जाते, मिलता नहीं है ज्ञान।।।
बोलो, जय जय हो मध्याह्न, बोलो, जय जय हो मध्याह्न।

चावल में कंकड़ है पत्थर, दाल है लगता पानी।
साग मिला न आलू चोखा, रो कर कहती रानी।

कौन है सुनता, कौन है देता, इन बच्चों पे ध्यान।।
बोलो, जय जय हो मध्याह्न, बोलो, जय जय हो मध्याह्न।

है प्रधान की नीयत खोटी, खाना बस बनवाएंगे।
हालत ऐसी बनी हुई है, बच्चे क्या पढ़ पाएंगे।
लूट मार के धंधे में, हैं शिक्षक बदनाम ।

जोड़ घटाओ करो कमाओं, कहते हैं प्रधान।
देख देख कर, सोच सोच कर, अक़ल है ये हैरान
बोलो, जय जय हो मध्याह्न, बोलो, जय जय हो मध्याह्न।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Monday, July 6, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,indian,school,food,education,sad
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
ये नज़्म 2012 में लिखने का अवसर प्राप्त हुआ था, उस समय ज़्यादा तरह स्कूलों में मध्यान्ह भोजन अच्छा नहीं बनता था, वैसे कुछ जगहों के लिए ये नज़्म आज भी सच्चाई है
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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