अपने आप में एक सिख
बुधवार, २१ जुलाई २०२१
जो हमारा है ही नही
उसका दान करना है सही?
जिसके हम जीवनदाता नहीं?
उसका जीवन छीनना है सही?
हम यदि किसीका जीवन बचा सकते नहीं
तो फिर उसका जीवन कैसे ले सकते है?
ये सवाल हमारे अंतरात्मा से पूछना चाहिए
सही मायनो में उत्तर ले लेना चाहिए।
हमपर किसीका बंधन नहीं हो सकता
धन होते हुए नहीं कोई निर्धन कैसे हो सकता है
निर्धन तो वो है जिसके पास देने को कुछ नहीं
हमारे पास तो करुणा का सागर है।
हजारो लोग यूँही मरते है
कीड़े मकोड़े का तो हिसाब ही नहीं है
हमरी एक जान के लिए हम कितने कितनो को मारते है
हमारी भूख मिटाने के लिए हम दूसरों की जान लेते है।
धर्म बलिदान देना सिखाता है
किसीकी बलि देना बिलकुल ही अमान्य है
ये जघन्य अपराध है
वध किसी हाल में अक्षम्य है
'किसीका जीवन' हमारा खानेका पर्याय कैसे हो सकता है?
हम इतने गीर गए है की किसीके जीवन को मिटा सकते है?
कोई शेर हमारा नवेला कर देता है तो हम शोर मचा देते है
जब तक मार नहीं देते और पकड़ नहीं लेते शांत नहीं बैठते है।
आज हम कितनी पीडा सह रहे है
कुदरत भी रूठी रूठी रहती है
कभी ज्यादा बारिशः, कभी गर्मी तो कभी ठंड से जान ले लेती है
हम समाज ले तो ठीक वरना वो सबक है।
कोई धर्म मारना नहीं सिखाता
वो तो अपने आप में एक सिख देता
बलिदान उसी का होता जो अपना अजीज होता है
बाकि तो सब दिखावा और छलावा होता है।
डॉ हसमुख मेहता
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